CJP प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने पर रोक, मेट्रो-इंटरनेट बहाल करने को कहा
- Shiv Kumar
- 11 Oct, 2026
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर मेट्रो सेवाएं बंद करने, इंटरनेट बाधित करने और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के आरोपों पर रविवार को सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने सुनवाई की। अदालत ने कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, इंटरनेट बाधित नहीं होना चाहिए और लोगों की आवाजाही नहीं रोकी जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान आदेश का उल्लंघन हुआ। इस पर अदालत ने दिल्ली के अधिकारियों को नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब मांगा। वहीं, मजिस्ट्रेट कोर्ट ने CJP नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को रविवार सुबह करीब 10 बजे रिहा करने का आदेश दिया। तीनों करीब 23 घंटे पुलिस हिरासत में रहे।
प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने पर दिल्ली में हुई थी बैरिकेडिंग
कॉकरोच जनता पार्टी और लेफ्ट ने 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR के विरोध में प्रदर्शन बुलाया था। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद शहर में कई जगह बैरिकेडिंग की गई। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और 7 हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। इसी कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की गई थीं। मामले की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने की। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। वहीं, कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े, शोएब आलम और शादान फरासत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें दीं।
प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हुए कहा कि लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उन्हें प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोका गया। शोएब आलम ने भी कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर लोगों को पूरी तरह रोकना उचित नहीं है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून के दायरे में होना चाहिए। मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि मामला केवल कुछ नेताओं या सांसदों की हिरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि कथित तौर पर हिरासत में लिए गए करीब 7,000 लोगों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। वकीलों ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों को दिल्ली के बाहर से आने पर हिरासत में लिया गया, कुछ के घरों पर छापे पड़े और कुछ पुलिसकर्मी बिना नेम बैज के थे। बल प्रयोग के आरोप भी लगाए गए। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारियों के उल्लंघन और बल प्रयोग के आरोपों की जांच होगी।
केंद्र ने कहा- सभी मेट्रो स्टेशन और इंटरनेट सेवा बहाल
केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं तथा इंटरनेट सेवा बहाल हो चुकी है। उनके मुताबिक, दिल्ली के 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 को बंद किया गया था, लेकिन शनिवार रात 10 बजे तक सभी स्टेशन खोल दिए गए। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 लागू होने के बोर्ड और बैरिकेडिंग का मुद्दा भी उठा। वकीलों ने कहा कि इन प्रतिबंधों के कारण अदालत पहुंचने में परेशानी हुई। मेहता ने इस बारे में जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। जस्टिस बागची ने कहा कि यदि वकीलों को प्रतिबंधों की जानकारी नहीं दी गई, तो यह आदेश को चुनौती देने का आधार हो सकता है। अदालत ने संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया।
मोबाइल फोन जब्त करने और मौलिक अधिकारों पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान एक वकील ने दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के बजाय उनके मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं। फोन में संवेदनशील जानकारी होने की बात उठाते हुए उन्हें वापस करने की मांग की गई। अदालत ने इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए अलग आवेदन दाखिल करने को कहा। जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दायित्व संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को रोकना है। वहीं, जस्टिस वी. मोहन ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण रहने और उकसावे से बचने की अपील की। अदालत ने अधिकारियों से कथित हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर जवाब मांगा है। संबंधित मामलों पर मंगलवार को एक साथ सुनवाई होगी।
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