यूरिया की कीमतों में राहत, किसानों की लागत घटेगी लेकिन सब्सिडी का बोझ बरकरार
- Babli Ansari
- 22 Oct, 2026
नई दिल्ली। यूरिया की कीमतों में आई नरमी ने देशभर के किसानों को कुछ राहत दी है। खरीफ और रबी दोनों मौसम में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली इस खाद के सस्ता होने से खेती की शुरुआती लागत घट सकती है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में इसका सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ेगा, क्योंकि गेहूं, धान और गन्ने की फसल में यूरिया की खपत ज्यादा होती है। हालांकि बाजार में कीमत घटने के बावजूद किसानों को यह राहत कितने समय तक मिलेगी, इस पर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। प्राकृतिक गैस, आयात लागत और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में बदलाव का असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि किसानों को सस्ती खाद मिलती रहे और सब्सिडी का बोझ भी नियंत्रण में रहे।
कीमतों में नरमी से खेती की लागत पर असर
जानकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के दामों में नरमी और आपूर्ति की स्थिति सुधरने से घरेलू कीमतों पर दबाव कम हुआ है। किसानों के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बुवाई के बाद फसल की बढ़वार के समय खाद खरीदने पर पहले की तुलना में कम खर्च करना पड़ सकता है। गांवों में किसान लंबे समय से डीजल, बीज, मजदूरी और कीटनाशकों की बढ़ती लागत से परेशान हैं। ऐसे में यूरिया की कीमत में मामूली कमी भी कुल लागत पर असर डालती है। कृषि विभागों और सहकारी समितियों को निर्देश दिए जाते रहे हैं कि खाद की बिक्री तय दर पर हो और दुकानदार इसके साथ दूसरे उत्पाद खरीदने की बाध्यता न बनाएं। सूत्रों के अनुसार, कई राज्यों में प्रशासन ने स्टॉक, वितरण और बिक्री रजिस्टर की निगरानी बढ़ाई है, ताकि कीमत घटने का लाभ किसान तक सीधे पहुंचे।
सब्सिडी से नियंत्रित होती है यूरिया की कीमत
यूरिया का खुदरा मूल्य सरकार की नीति और सब्सिडी व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है। केंद्र सरकार किसानों को राहत देने के लिए खाद की वास्तविक लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वहन करती है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने पर भी किसानों पर पूरा बोझ नहीं पड़ता। मगर इस व्यवस्था की कीमत सरकारी खजाने को चुकानी पड़ती है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यूरिया सस्ता रहने से इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल बढ़ता है, जिससे मिट्टी का संतुलन बिगड़ता है और नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश के इस्तेमाल में असमानता पैदा होती है। सरकार ने कई मौकों पर संतुलित खाद उपयोग और मृदा परीक्षण की सलाह दी है। इसके बावजूद खेत स्तर पर यूरिया की मांग बनी हुई है। नई नीतियों में उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और गैस लागत को तर्कसंगत बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
किसानों को राहत, लेकिन निगरानी जरूरी
किसान संगठनों का कहना है कि कीमतों में कमी का लाभ तभी स्थायी राहत बनेगा, जब बाजार में पर्याप्त स्टॉक और पारदर्शी वितरण व्यवस्था रहे। कई इलाकों में खाद की किल्लत के दौरान किसान लंबी कतारों में खड़े होने और ऊंचे दाम चुकाने को मजबूर होते हैं। पंजाब और हरियाणा में धान-गेहूं चक्र, जबकि उत्तर प्रदेश में गेहूं, धान और गन्ने की खेती यूरिया की उपलब्धता पर काफी निर्भर है। सरकार ने रबी सीजन में यूरिया और डीएपी की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने का भरोसा दिया है और जमाखोरी तथा कृत्रिम कमी पर कार्रवाई की चेतावनी दी है। जानकारों के मुताबिक, आगे कीमतों की दिशा प्राकृतिक गैस, समुद्री भाड़े और वैश्विक तनाव पर निर्भर करेगी। किसानों को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन असली कसौटी समय पर उपलब्धता, तय कीमत और संतुलित खाद इस्तेमाल की होगी।
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