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Rana Sanga पर नहीं थम रहा सियासी संग्राम, सपा ने कसी कमर, ईद के बाद करेगी ये बड़ा काम

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आगरा में सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के आवास पर करणी सेना द्वारा किए गए हमले के बाद पार्टी अब पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है।
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आगरा में सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के आवास पर करणी सेना द्वारा किए गए हमले के बाद पार्टी अब पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस घटना के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराते हुए इसे दलित समाज पर हमला करार दिया है। वहीं, सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव ने सुमन से मुलाकात कर उनका समर्थन जताया और ईद के बाद प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करने का ऐलान कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

सांसद रामजी लाल सुमन ने इतिहास के एक प्रसंग पर टिप्पणी करते हुए राणा सांगा को लेकर विवादित बयान दिया था, जिससे विहिप और करणी सेना जैसे हिंदू संगठनों ने नाराजगी जताई। इसी के बाद करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने आगरा स्थित उनके आवास पर हमला कर दिया और जमकर तोड़फोड़ की। हालांकि, पहले सपा बैकफुट पर दिखी और सफाई देते हुए राणा सांगा को महापुरुष बताया, लेकिन अब पार्टी खुलकर सांसद के समर्थन में आ गई है।

पीडीए के जरिए दलित वोट बैंक साधने की रणनीति

सपा ने लोकसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ का फार्मूला अपनाया था, जिसका उसे 37 सीटों पर जीत के रूप में फायदा भी मिला। यही वजह है कि अखिलेश यादव अब इस मुद्दे को दलित अस्मिता से जोड़कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जाटव समाज से आने वाले रामजी लाल सुमन को केंद्र में रखकर सपा ठाकुरवाद बनाम दलित गोलबंदी की रणनीति पर काम कर रही है।

बीजेपी को घेरने की सपा की नई चाल

विश्लेषकों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ठाकुर समाज का एकतरफा झुकाव बीजेपी की ओर है, इसलिए सपा अब दलित और मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में 56% गैर-जाटव दलित वोट सपा को मिले, जबकि बसपा का ग्राफ गिरा है। बसपा से निराश दलित वोटर अब नई लीडरशिप की तलाश में है और सपा इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहती है।

क्या होगा आगे?

सपा ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर अपने दलित सांसद के साथ मजबूती से खड़ी रहेगी। ईद के बाद पूरे प्रदेश में पीडीए सम्मान आंदोलन चलाया जाएगा, जिसमें बीजेपी को दलित विरोधी साबित करने की कोशिश होगी। आगरा से शुरू हुई यह लड़ाई अब पूरे यूपी में जातीय अस्मिता की नई राजनीतिक जंग में बदलने जा रही है।

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