जेवर में पराली जलाने की शुरुआत, प्रदूषण से बढ़ी चिंता

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पराली जलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी

Greater Noida:  धान की कटाई का मौसम शुरू होते ही जेवर क्षेत्र में कुछ किसानों ने खेतों में पराली जलाना शुरू कर दिया है। पराली जलाने से न केवल वातावरण में प्रदूषण फैल रहा है बल्कि खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी खराब हो रही है। सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि पराली जलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी, बावजूद इसके कुछ किसान नियमों की अनदेखी कर रहे हैं।


पर्यावरण और मिट्टी पर दोहरा असर
धान की फसल की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाने से हवा में धुआँ फैलता है, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है। इससे न केवल आस-पास के क्षेत्रों में धुंध की स्थिति बनती है, बल्कि लोगों को सांस लेने में भी परेशानी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और उसमें मौजूद सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। इससे भविष्य की फसलों की उपज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रशासन की चेतावनी, कार्रवाई के संकेत
प्रशासन ने किसानों को चेताया है कि खेतों में पराली जलाने पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बावजूद इसके, जेवर के थोरा गाँव में कई किसानों को धान की कटाई के बाद पराली के बड़े ढेरों में आग लगाते देखा गया। शाम के समय इलाके में घना धुआँ फैल गया, जिससे वातावरण धुंधला हो गया। अधिकारियों का कहना है कि नियमों का पालन न करने वालों पर जल्द ही सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पराली जलाने के बजाय करें वैकल्पिक प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञों और प्रशासन की सलाह है कि किसान पराली को जलाने के बजाय उसका जैविक प्रबंधन करें। कटाई के बाद खेतों में पानी भरने या नमी बनाए रखने से पराली 15 दिनों में सड़कर प्राकृतिक खाद में बदल जाती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और अगली फसल के लिए उर्वरक पर होने वाला खर्च भी कम होता है।

सस्ती और उपयोगी तकनीकें
पराली को जलाने की जगह हार्वेस्टर से कटाई के बाद उसे खेत में जोतकर मिट्टी में मिला सकते हैं। खेतों में पानी और यूरिया का छिड़काव करने से पराली तेजी से सड़ जाती है और यह मिट्टी के लिए जैविक खाद का काम करती है। इन उपायों से किसानों को दोहरा लाभ मिलेगा। पर्यावरण प्रदूषण से बचाव भी होगा और फसल की गुणवत्ता में सुधार भी आएगा।

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