नोएडा अंडरग्राउंड केबलिंग घोटाले में एक्शन, मच गया हड़कंप, तीन अधिकारियों पर चार्जशीट की तैयारी
- Shiv Kumar
- 12 Feb, 2026
नोएडा प्राधिकरण में अंडरग्राउंड केबलिंग घोटाले से जुड़े बहुचर्चित यादव सिंह प्रकरण में एक बार फिर प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से लंबित विभागीय कार्रवाई को अब आगे बढ़ाते हुए प्राधिकरण ने तीन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय चार्जशीट देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसमें वर्तमान महाप्रबंधक जल-सीवर एवं ईएंडएम आरपी सिंह समेत निजामुद्दीन और प्रमोद शामिल हैं, जिनका पहले ही नोएडा से तबादला हो चुका है। शासन स्तर से लगातार पूछताछ और देरी पर नाराजगी के बाद अब प्राधिकरण ने जांच प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने का फैसला लिया है।
जांच कमेटी गठित, लंबित फाइलों पर बढ़ा दबाव
सीईओ के निर्देश पर कार्मिक विभाग के ओएसडी अशोक कुमार शर्मा की अध्यक्षता में दो वरिष्ठ प्रबंधकों की जांच कमेटी गठित कर दी गई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, सीबीआई की चार्जशीट में नाम शामिल होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की फाइल शासन को नहीं भेजी गई थी। शासन की ओर से कई बार इस पर जवाब मांगा गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। इसी दौरान संबंधित अधिकारियों को पदोन्नति का लाभ भी मिल गया, जिससे सवाल और गहराए। अब शासन ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए जवाब तलब किया है और जांच रिपोर्ट जल्द भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
पहले दर्ज कराई शिकायत, अब खुद बने आरोपी
दिलचस्प पहलू यह है कि इस पूरे मामले में सेक्टर-39 थाने में मुकदमा दर्ज कराने वाले तत्कालीन एपीई आरपी सिंह खुद अब चार्जशीट में शामिल कर लिए गए हैं। वह सीबीआई जांच के दौरान गवाह भी रहे और कई बार पूछताछ के लिए बुलाए गए थे। आरपी सिंह का कहना है कि उस समय लागू रेट कोड पूरे प्राधिकरण में प्रभावी था, इसलिए जांच एजेंसी ने उन्हें भी जांच के दायरे में शामिल कर लिया। वर्ष 2020 में इसी प्रकरण में यादव सिंह समेत करीब 20 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी, लेकिन उस समय इन तीन अधिकारियों को बाहर रखा गया था।
जल्द शासन को भेजी जाएगी जांच रिपोर्ट
एसीईओ वंदना त्रिपाठी ने पुष्टि की है कि तीनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और जांच कमेटी गठित कर दी गई है। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे शासन को भेजा जाएगा, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। माना जा रहा है कि इस कदम से वर्षों से लंबित प्रकरण में अब निर्णायक मोड़ आ सकता है और विभागीय जवाबदेही तय होने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।
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