नोएडा हादसे में युवराज मौत मामले में बिल्डर को बड़ी राहत, कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत, देश छोड़ने की इजाजत नहीं, जांच में सहयोग का आदेश
- Shiv Kumar
- 20 Feb, 2026
नोएडा सेक्टर-150 स्थित टी-प्वाइंट के पास पानी से भरे गड्ढे में कार गिरने से सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में सत्र अदालत ने बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत दे दी है। अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि प्रथम दृष्टया आरोपी की प्रत्यक्ष या सचेत भूमिका स्थापित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक प्रतीत नहीं होती। अदालत ने शर्त रखी है कि आरोपी बिना न्यायालय की अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे और जांच में पूरा सहयोग करेंगे।
दो साल से निर्माण स्थल पर लगी थी रोक, स्वामित्व संबंध पर उठे सवाल
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनोज भाटी बोड़ाकी और शोभाराम चंदील ने दलील दी कि आरोपी एक प्रतिष्ठित व्यवसायी हैं और एफआईआर में उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। उनका कहना था कि आरोपी संबंधित कंपनी के निदेशक या की-मैनेजरियल पर्सन नहीं रहे हैं तथा कंपनी के अधिकांश शेयर पहले ही दूसरी कंपनी को हस्तांतरित किए जा चुके थे। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि आरोपी का विवादित भूमि पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था। साथ ही, उनके विरुद्ध किसी आपत्तिजनक वस्तु की बरामदगी भी प्रस्तावित नहीं है।
जलभराव और निर्माण रोक पर भी हुई चर्चा
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि निर्माण स्थल पर दो वर्षों से अधिक समय से नोएडा प्राधिकरण द्वारा रोक लगी हुई थी। आदेश में उल्लेख किया गया कि 18 जनवरी 2021 को प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में संबंधित भूखंड पर निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में जनवरी 2026 में हटाया गया। अदालत ने यह भी कहा कि कॉर्पोरेट संरचना, लीज, सब-लीज, शेयर ट्रांसफर और एमओयू जैसे मामलों में केवल स्वामित्व संबंध के आधार पर आपराधिक दायित्व तय नहीं किया जा सकता।
जलनिकासी प्रस्ताव और पूर्व आवेदन का जिक्र
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि जलभराव की समस्या को लेकर विजटाउन प्लानर्स द्वारा वर्ष 2022 में आवेदन दिया गया था। इसके बाद 2023 में सिंचाई विभाग की ओर से जलनिकासी के लिए प्रस्ताव रखा गया था। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी कंपनी के प्रमोटर हैं और इस नाते जिम्मेदार हैं, लेकिन अदालत ने कहा कि ‘प्रमोटर’ शब्द की स्पष्ट कानूनी परिभाषा और दायित्व का निर्धारण उपलब्ध दस्तावेजों से स्थापित नहीं होता।
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