नोएडा में बनेगा नया डियर पार्क, लेकिन क्या दोहराई जाएगी दिल्ली की पुरानी गलती?

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नोएडा प्राधिकरण एक नए डियर पार्क को विकसित करने में जुटा है, लेकिन इसके साथ दिल्ली के पुराने डियर पार्क की नाकामियों की याद भी ताज़ा हो गई है। जानकारों का कहना है कि अगर योजना और देखरेख कमजोर रही, तो यह परियोजना भी विवादों में फंस सकती है।

नोएडा। शहर में एक नया डियर पार्क विकसित करने की तैयारी ने सैर-सपाटे के शौकीनों के लिए उत्साह तो पैदा किया है, लेकिन इसके साथ एक पुराना सवाल भी लौट आया है—क्या नोएडा दिल्ली की गलतियों से सबक लेगा या वही मॉडल दोहराएगा? जानकारी के मुताबिक परियोजना को ऐसे सार्वजनिक आकर्षण के रूप में देखा जा रहा है, जहां हरियाली, जैव-विविधता और शहरी मनोरंजन को एक साथ जोड़ा जाएगा। लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों और शहरी योजनाकारों का कहना है कि सिर्फ जानवरों को लाकर बाड़ेबंदी कर देना पार्क नहीं बनाता, उसके लिए जगह, भोजन, पानी, पशु-स्वास्थ्य और मानवीय दखल पर सख्त नियंत्रण चाहिए। दिल्ली के अनुभव ने यही दिखाया था कि कमजोर प्रबंधन किसी भी ऐसे परिसर को धीरे-धीरे परेशानी में बदल देता है।

योजना के केंद्र में क्या है

प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार प्रस्तावित डियर पार्क को शहर के बढ़ते शहरी दबाव के बीच एक नए सार्वजनिक स्थल की तरह देखा जा रहा है, जहां परिवारों के लिए खुला वातावरण और बच्चों के लिए प्रकृति से जुड़ाव तैयार किया जा सके। सूत्रों के मुताबिक इस परियोजना में हिरणों के लिए नियंत्रित आवास, हरे-भरे हिस्से, दर्शकों के लिए तय गलियारे और सुरक्षा व्यवस्था शामिल करने की चर्चा है। लेकिन असली चुनौती कागज़ पर नहीं, जमीन पर है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर enclosure का आकार, पशुओं की संख्या और देखरेख का ढांचा सही नहीं हुआ, तो तनाव, बीमारी और चोट का खतरा बढ़ सकता है। शहरी वन्यजीव परियोजनाओं में यह संतुलन सबसे मुश्किल माना जाता है, क्योंकि यहां मनोरंजन और संरक्षण के बीच बहुत महीन रेखा होती है।

दिल्ली के डियर पार्क से जुड़े पुराने अनुभवों ने भी बहस को और तेज कर दिया है। वहां समय-समय पर रखरखाव, भीड़ और पशुओं की हालत को लेकर सवाल उठते रहे, और उसी वजह से अब नोएडा योजना पर निगाहें ज्यादा सख्त हो गई हैं। स्थानीय प्रशासन के सामने अब यह साबित करने की चुनौती है कि यह सिर्फ एक आकर्षक बोर्ड और फाइल में दर्ज योजना नहीं होगी, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला संवेदनशील प्रोजेक्ट बनेगा। जानकारों का कहना है कि यदि पशु-कल्याण मानक, नियमित पशु-चिकित्सा, पर्यटकों की सीमा और पर्यावरणीय असर का आकलन शुरू से साफ नहीं रखा गया, तो आने वाले वक्त में यही पार्क विवाद का केंद्र बन सकता है।

दिल्ली की सीख, नोएडा की परीक्षा

शहरी विकास के नाम पर कई शहर ऐसे प्रोजेक्ट शुरू करते हैं, जिनका मकसद पर्यटन बढ़ाना और नागरिकों के लिए नई जगह बनाना होता है। लेकिन वन्यजीवों के मामले में मानक थोड़ा अलग और कहीं ज्यादा सख्त हो जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिरण जैसे जानवर खुली जगह, शांत माहौल और कम मानवीय हस्तक्षेप में बेहतर रहते हैं। अगर पार्क को सिर्फ फोटो-ऑप और वीकेंड डेस्टिनेशन की तरह डिजाइन किया गया, तो उसकी मूल अवधारणा कमजोर पड़ सकती है। यही वजह है कि दिल्ली में उठे सवाल अब नोएडा के लिए चेतावनी की तरह देखे जा रहे हैं।

बताया जा रहा है कि परियोजना आगे बढ़ने के साथ निगरानी, रखरखाव और संचालन मॉडल पर भी फैसला अहम होगा। शहर के लोगों में उम्मीद है कि नया पार्क नोएडा को एक और हरा-भरा सार्वजनिक स्थल देगा, लेकिन भरोसा तभी बनेगा जब प्रशासन पारदर्शी ढंग से बताए कि जानवर कहां से आएंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा और पार्क की रोजमर्रा की लागत कैसे पूरी होगी। फिलहाल तस्वीर यही है कि योजना रोमांचक जरूर है, मगर सफलता की असली कसौटी उसका प्रबंधन होगा। दिल्ली की गलती अगर दोहराई गई, तो यह परियोजना नाम के आकर्षण से आगे नहीं बढ़ पाएगी।

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