19 साल बाद मिला इंसाफ, ग्रेटर नोएडा के 16 घरों को बचाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के 16 मकान मालिकों को बड़ी राहत दी है। 2007 में शुरू हुए भूमि अधिग्रहण विवाद में अदालत ने उनके आवासीय प्लॉटों को अधिग्रहण से बाहर कर दिया

ग्रेटर नोएडा के 16 मकान मालिकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। वर्ष 2007 से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण विवाद में अदालत ने इन परिवारों के आवासीय प्लॉटों को अधिग्रहण की प्रक्रिया से बाहर कर दिया है। लगभग 19 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला सुनाया।

सिर्फ घर बचाने की थी मांग
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 25 जून को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं का उद्देश्य पूरे भूमि अधिग्रहण को चुनौती देना नहीं था। उन्होंने केवल अपने आवासीय मकानों को अधिग्रहण से बचाने की मांग की थी। अदालत ने माना कि यह मामला सामान्य भूमि विवाद से अलग है और इसमें मानवीय पहलू भी जुड़ा हुआ है।

जीवनभर की कमाई से बने थे छोटे-छोटे घर
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह दलील रखी गई कि प्रभावित परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की बचत से छोटे-छोटे घर बनाए हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य अपने आशियाने को सुरक्षित रखना था। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में अधिग्रहण को पूरी सख्ती से लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।

अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष राहत
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए केवल इन 16 अपीलकर्ताओं के आवासीय भूखंडों को अधिग्रहण से मुक्त करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि बाकी भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के लिए पूरी तरह वैध रहेगा और उस पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।

2007 में हुआ था 230 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण
यह विवाद वर्ष 2007 में शुरू हुआ था, जब ग्रेटर नोएडा में करीब 230 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया। उसी दौरान इन 16 परिवारों के मकान भी अधिग्रहण के दायरे में आ गए थे। इसके बाद प्रभावित परिवारों ने अपने घर बचाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।

किसानों का आंदोलन भी बना चर्चा का विषय
इसी बीच ग्रेटर नोएडा के पाली गांव समेत कई क्षेत्रों के किसानों ने भी आबादी भूखंडों की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया। करीब 40 गांवों के किसानों ने महापंचायत कर लखनऊ तक पैदल मार्च का ऐलान किया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल 16 अपीलकर्ताओं के आवासीय प्लॉटों तक सीमित है और अन्य भूमि पर अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी रहेगी।

प्रभावित परिवारों के लिए बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से 16 परिवारों के सिर से बेघर होने का खतरा टल गया है। अदालत ने साफ किया कि विशेष परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें राहत दी गई है। वहीं सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित शेष भूमि पर सरकार का अधिकार पहले की तरह बरकरार रहेगा। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की मिसाल के रूप में भी देखा जा रहा है।

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