इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सरकारी सर्जन के खिलाफ एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्रवाई रद्द
- Shiv Kumar
- 13 Sep, 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों और लोकसेवकों को कानूनी सुरक्षा देने वाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की एसीजेएम अदालत की ओर से सरकारी सर्जन डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के तहत लोकसेवक के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इस मामले में अदालत ने माना कि संबंधित प्रक्रिया पूरी किए बिना एफआईआर का आदेश दिया गया था।
सर्जरी के बाद पथरी रह जाने का लगाया था आरोप
गौतमबुद्ध नगर निवासी धीरेंद्र ने यथार्थ अस्पताल में अपनी पत्नी की लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी सर्जरी के दौरान मेडिकल लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। शिकायतकर्ता के मुताबिक, सर्जरी के बाद मरीज के पेट में 10 मिलीमीटर की पथरी रह गई थी, जिसे बाद में दूसरे अस्पताल में सर्जरी कराकर निकलवाना पड़ा। मामले की जांच के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। सरकारी अस्पताल के कंसल्टेंट सर्जन डॉ. राहुल वर्मा भी इस समिति के सदस्य थे। शिकायतकर्ता समिति की जांच रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने अदालत का रुख किया।
एसीजेएम ने बिना जवाब लिए दिया एफआईआर का आदेश
मामले में गौतमबुद्ध नगर के एसीजेएम प्रथम ने एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद डॉ. राहुल वर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के प्रावधानों पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि किसी लोकसेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन से जुड़े मामले में जांच का आदेश देने से पहले संबंधित वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट लेना और आरोपी लोकसेवक का पक्ष सुनना जरूरी है। हाईकोर्ट के मुताबिक, एसीजेएम अदालत ने डॉ. वर्मा से उनका पक्ष जाने बिना सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया, जो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था।
जांच समिति के सदस्य थे डॉ. राहुल वर्मा
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डॉ. राहुल वर्मा मरीज के इलाज या सर्जरी में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे। वह मुख्य चिकित्सा अधिकारी की ओर से गठित तीन सदस्यीय जांच समिति के सदस्य के तौर पर अपने सरकारी दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। कोर्ट ने रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं पाया, जिससे यह साबित हो कि डॉ. वर्मा सर्जरी या मरीज के उपचार से सीधे जुड़े थे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश अंबेडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए आदेश का भी हवाला दिया और कहा कि लोकसेवक के खिलाफ कार्रवाई में निर्धारित प्रक्रियागत सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने एफआईआर समेत पूरी कार्रवाई की रद्द
सभी तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने एसीजेएम अदालत के 12 अगस्त के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही डॉ. वर्मा के संबंध में शुरू की गई पूरी आपराधिक कार्यवाही भी निरस्त कर दी गई। कोर्ट के इस फैसले में लोकसेवकों के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए जाने पर जोर दिया गया है।
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