बिल्डर दिवालिया हो जाए तो नोएडा के फ्लैट खरीदार क्या करें? NCLAT के ताजा फैसले और रेरा-आईबीसी के विकल्प

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नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बिल्डर के दिवालिया होने पर फ्लैट खरीदारों के पास रेरा, उपभोक्ता आयोग और आईबीसी के तहत विकल्प हो सकते हैं। शुभकामना बिल्डटेक मामले में NCLAT के फैसले, 2026 के संशोधन और घर खरीदारों के कानूनी अधिकारों को आसान भाषा में समझें।

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी परेशानी तब खड़ी होती है, जब बिल्डर आर्थिक संकट में फंस जाता है या उसके खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ऐसे में खरीदारों को समझ नहीं आता कि वे अपने पैसे वापस लेने के लिए कहां जाएं, अधूरे फ्लैट का कब्जा कैसे हासिल करें और वर्षों से अटकी रजिस्ट्री का क्या होगा। इस बीच नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) का शुभकामना बिल्डटेक मामले में 16 सितंबर 2026 का फैसला भी चर्चा में है। ट्रिब्यूनल ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की अपील खारिज करते हुए उन्हें सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा देने से इनकार कर दिया। इस मामले में 2026 के दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) संशोधन की भी अहम भूमिका रही। हालांकि, यह फैसला सीधे तौर पर हर फ्लैट खरीदार को रिफंड या कब्जा दिलाने का आदेश नहीं है। इसका महत्व दिवाला प्रक्रिया में अलग-अलग तरह के लेनदारों की स्थिति और उनके भुगतान की प्राथमिकता से जुड़ा है। ऐसे में घर खरीदारों के लिए जरूरी है कि वे RERA, उपभोक्ता आयोग और IBC के तहत उपलब्ध विकल्पों को समझें। सही मंच का चुनाव इस बात पर निर्भर करेगा कि बिल्डर के खिलाफ पहले से कोई आदेश है या नहीं, कंपनी की दिवाला प्रक्रिया शुरू हो चुकी है या नहीं और खरीदार की मांग फ्लैट का कब्जा है या पैसा वापस लेना।


NCLAT का ताजा फैसला: नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की अपील खारिज

NCLAT ने 16 सितंबर 2026 को शुभकामना बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड की दिवाला प्रक्रिया से जुड़े मामले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की अपील खारिज कर दी। दोनों प्राधिकरण चाहते थे कि उनके बकाया को सुरक्षित ऋणदाता के दावे के रूप में माना जाए, ताकि दिवाला प्रक्रिया में उन्हें कानून के अनुसार सुरक्षित लेनदारों वाली प्राथमिकता मिल सके। ट्रिब्यूनल ने संबंधित लीज डीड और IBC के प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि इन दस्तावेजों के आधार पर प्राधिकरणों के पक्ष में ऐसा सुरक्षा हित साबित नहीं होता, जो उन्हें सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा दिला सके। इस मामले में कंपनी की समाधान योजना पहले ही मंजूर हो चुकी थी और प्राधिकरणों के बकाये को असुरक्षित वैधानिक या परिचालन देनदारी के रूप में रखा गया था। फैसले का असर दिवाला प्रक्रिया में रकम के बंटवारे और लेनदारों की श्रेणी पर पड़ता है। हालांकि, इसे इस तरह नहीं समझना चाहिए कि सभी बिल्डर परियोजनाओं में प्राधिकरणों के दावे एक जैसे होंगे या हर खरीदार को अपने आप राहत मिल जाएगी।


प्राधिकरण को असुरक्षित परिचालन ऋणदाता मानने का मतलब

किसी कंपनी के दिवालिया होने पर सभी लेनदारों को एक ही तरह से भुगतान नहीं किया जाता। IBC में लेनदार की श्रेणी और उसके दावे की कानूनी स्थिति महत्वपूर्ण होती है। सुरक्षित ऋणदाता के पास आम तौर पर किसी संपत्ति पर कानूनन मान्य सुरक्षा हित होता है, जबकि असुरक्षित परिचालन ऋणदाता के पास ऐसा सुरक्षा अधिकार नहीं होता। शुभकामना बिल्डटेक मामले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों को सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा नहीं मिला और उनके दावों को असुरक्षित परिचालन देनदारी की श्रेणी में ही रखा गया। इसका मतलब यह है कि केवल प्राधिकरण का बकाया होना या लीज डीड में कुछ भुगतान संबंधी शर्तें होना अपने आप सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा नहीं देता। इसके लिए कानून के तहत मान्य सुरक्षा हित की शर्तें पूरी होनी चाहिए। फ्लैट खरीदारों के लिए इस फैसले का महत्व दिवाला प्रक्रिया में लेनदारों के अधिकारों और भुगतान की व्यवस्था को समझने में है। लेकिन इससे किसी खरीदार के रिफंड, कब्जे या मुआवजे का दावा अपने आप स्वीकार नहीं हो जाता।


2026 के IBC संशोधन की भूमिका

दिवाला एवं दिवालियापन संहिता संशोधन अधिनियम, 2026 को 6 अप्रैल 2026 को मंजूरी मिली और इसके कई प्रावधान 26 मई 2026 से लागू किए गए। संशोधन के तहत सुरक्षा हित की परिभाषा में बदलाव किया गया, जिसमें केवल कानून के अपने आप लागू होने से बने चार्ज को सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा देने के आधार के रूप में स्वीकार करने पर रोक से जुड़ा स्पष्टीकरण शामिल है। शुभकामना बिल्डटेक मामले में NCLAT ने इस संशोधन पर विचार करते हुए प्राधिकरणों के दावों को सुरक्षित ऋणदाता की श्रेणी में रखने से इनकार किया। यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि 2026 का संशोधन सभी होमबायर्स के अधिकार समाप्त नहीं करता और न ही फ्लैट खरीदारों को IBC से बाहर करता है। घर खरीदारों की वित्तीय लेनदार के रूप में स्थिति अलग कानूनी आधार पर बनी रहती है। इसलिए किसी परियोजना में दिवाला प्रक्रिया शुरू होने पर खरीदारों को संबंधित आदेश, समाधान योजना और अपने दावे की स्थिति देखनी चाहिए। केवल संशोधन या NCLAT के इस फैसले के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर परियोजना में एक जैसा परिणाम निकलेगा।


इस फैसले का फ्लैट खरीदारों पर क्या असर पड़ सकता है

शुभकामना बिल्डटेक मामले का फैसला सीधे तौर पर फ्लैट खरीदारों को कब्जा दिलाने या भुगतान वापस कराने का आदेश नहीं है, लेकिन यह दिवाला प्रक्रिया में अलग-अलग लेनदारों की स्थिति स्पष्ट करता है। प्राधिकरणों को सुरक्षित ऋणदाता का दर्जा न मिलने से उनके दावों की प्राथमिकता पर असर पड़ता है। इसका महत्व उन मामलों में है, जहां समाधान योजना के तहत उपलब्ध रकम का बंटवारा किया जाना है। घर खरीदारों को यह देखना चाहिए कि उनकी परियोजना की दिवाला प्रक्रिया किस चरण में है, समाधान योजना मंजूर हुई है या नहीं और उनके दावे को किस तरह दर्ज किया गया है। अगर कंपनी के खिलाफ NCLT में प्रक्रिया चल रही है, तो खरीदार को संबंधित रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल या अधिकृत प्रतिनिधि से संपर्क कर अपने दावे की स्थिति पता करनी चाहिए। किसी भी भुगतान, अतिरिक्त रकम की मांग या समाधान योजना में बदलाव से जुड़े मामले में आधिकारिक दस्तावेज देखना जरूरी है। इस फैसले से सभी खरीदारों को अतिरिक्त मुआवजा या तत्काल रिफंड मिलने की गारंटी नहीं बनती।


दिवालिया बिल्डर के मामले में होमबायर्स के अधिकार

फ्लैट खरीदारों के पास बिल्डर के खिलाफ कानूनी अधिकार होते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल परियोजना की स्थिति और मामले के तथ्यों के अनुसार करना पड़ता है। अगर बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया, निर्माण अधूरा छोड़ दिया या समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया, तो खरीदार उचित मंच पर शिकायत कर सकता है। परिस्थितियों के अनुसार वह कब्जा, जमा रकम की वापसी, ब्याज या मुआवजे की मांग कर सकता है। अगर बिल्डर कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू हो चुकी है, तो खरीदार को यह भी जांचना होगा कि उसके दावे किस प्रक्रिया के तहत दर्ज किए जाने हैं और क्या कोई समयसीमा लागू है। दिवाला प्रक्रिया शुरू होने पर कंपनी के खिलाफ कुछ वसूली और कानूनी कार्रवाइयों पर रोक लागू हो सकती है, इसलिए हर मामले में सामान्य शिकायत की तरह आगे बढ़ना सही नहीं होता। खरीदार को अपना बुकिंग फॉर्म, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट, भुगतान रसीदें, बैंक रिकॉर्ड, कब्जे से संबंधित पत्र और पहले की शिकायतों के दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। ये रिकॉर्ड दावा साबित करने में मदद कर सकते हैं।


IBC में फ्लैट खरीदार का दर्जा

IBC के तहत फ्लैट खरीदारों को आम तौर पर वित्तीय लेनदार (Financial Creditor) माना जाता है, क्योंकि वे बिल्डर की परियोजना में घर खरीदने के लिए रकम देते हैं। कानून में उन्हें एक वर्ग के रूप में भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। यदि बिल्डर कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू होती है, तो पात्र खरीदार अपने दावे को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की ओर से जारी सार्वजनिक घोषणा और दावे जमा करने संबंधी निर्देशों पर नजर रखना जरूरी है। खरीदार को अपने भुगतान का पूरा विवरण, फ्लैट की पहचान, बुकिंग से जुड़े दस्तावेज और बकाया मांग का आधार उपलब्ध कराना चाहिए। दावे की स्वीकृति और उसकी रकम का निर्धारण संबंधित रिकॉर्ड तथा लागू कानून के अनुसार किया जाता है। केवल फ्लैट बुक कराने से यह गारंटी नहीं मिलती कि पूरी रकम वापस मिल जाएगी या कब्जा निश्चित समय में मिल जाएगा। समाधान योजना में खरीदारों के हितों पर क्या असर पड़ेगा, यह परियोजना की वित्तीय स्थिति, उपलब्ध संपत्ति और मंजूर योजना पर निर्भर करता है। इसलिए दिवाला प्रक्रिया की सूचना मिलते ही दस्तावेजों और दावे की स्थिति की जांच करना उपयोगी है।


कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में भागीदारी

दिवाला प्रक्रिया में कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) वह समिति है, जो पात्र वित्तीय लेनदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है और समाधान योजना पर महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। जब किसी बिल्डर के खिलाफ CIRP चलती है, तो पात्र फ्लैट खरीदारों को एक वर्ग के रूप में इसमें प्रतिनिधित्व मिल सकता है। कानून के अनुसार, खरीदारों के वर्ग की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि (Authorised Representative) समिति की बैठकों में उनके हितों का प्रतिनिधित्व करता है। खरीदारों को इस प्रतिनिधि के माध्यम से मिलने वाली सूचना, प्रस्तावित समाधान योजना और मतदान से संबंधित जानकारी पर ध्यान देना चाहिए। CoC में भागीदारी का अर्थ यह नहीं है कि हर खरीदार व्यक्तिगत रूप से सभी बैठकों में सीधे हिस्सा लेगा या उसके सुझाव को अकेले निर्णायक माना जाएगा। निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और मतदान व्यवस्था के अनुसार होते हैं। इसलिए खरीदारों को अधिकृत प्रतिनिधि के संपर्क विवरण, दावे की स्वीकृति और परियोजना से जुड़े अपडेट संभालकर रखने चाहिए। अगर समाधान योजना में कब्जे, रिफंड या अतिरिक्त भुगतान से संबंधित शर्तें हों, तो उन्हें ध्यान से पढ़ना चाहिए और जरूरत पड़ने पर दिवाला कानून के जानकार से सलाह लेनी चाहिए।


फ्लैट खरीदार के पास कौन-कौन से कानूनी विकल्प हैं

दिवालिया या निर्माण रोक चुके बिल्डर के खिलाफ खरीदार के पास मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश रेरा, उपभोक्ता आयोग और IBC की प्रक्रिया जैसे विकल्प हो सकते हैं। किस मंच पर जाना चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि खरीदार फ्लैट का कब्जा चाहता है या रकम वापस, परियोजना रेरा के दायरे में आती है या नहीं और बिल्डर के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू हो चुकी है या नहीं। यदि रेरा के तहत शिकायत की जा सकती है, तो खरीदार कब्जे, रिफंड, ब्याज या कानून के अनुसार उपलब्ध राहत की मांग कर सकता है। उपभोक्ता आयोग में भी सेवा में कमी या अनुचित व्यवहार से जुड़े दावे परिस्थितियों के आधार पर उठाए जा सकते हैं। वहीं, अगर कंपनी के खिलाफ CIRP शुरू हो चुकी है, तो IBC की समयसीमा और प्रक्रिया के मुताबिक दावा दर्ज करना महत्वपूर्ण हो जाता है। एक ही विवाद को अलग-अलग मंचों पर ले जाने से पहले यह जांचना चाहिए कि कौन-सी कार्यवाही कानूनन जारी रखी जा सकती है और क्या किसी अन्य प्रक्रिया के कारण रोक लागू है। जल्दबाजी में आवेदन देने के बजाय दस्तावेजों के साथ कानूनी सलाह लेना बेहतर रहता है।


UP RERA में शिकायत कैसे करें

अगर बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया है, समझौते का पालन नहीं किया या परियोजना से जुड़ी जिम्मेदारियां पूरी नहीं की हैं, तो पात्र खरीदार UP RERA में शिकायत करने का विकल्प देख सकते हैं। इसके लिए उत्तर प्रदेश रेरा की आधिकारिक वेबसाइट पर शिकायत संबंधी अनुभाग में जाकर उपलब्ध निर्देशों के अनुसार आवेदन किया जा सकता है। शिकायत से पहले परियोजना का पंजीकरण विवरण, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट, भुगतान की रसीदें, कब्जे की तय तारीख, बिल्डर के साथ हुई बातचीत और अन्य संबंधित दस्तावेज तैयार रखें। शिकायत में साफ तौर पर बताएं कि समस्या क्या है और आप किस तरह की राहत चाहते हैं, जैसे कब्जा, रिफंड, ब्याज या मुआवजा, जहां कानून इसकी अनुमति देता हो। आवेदन जमा करने से पहले शुल्क, दस्तावेजों और प्रक्रिया से जुड़ी मौजूदा शर्तें आधिकारिक वेबसाइट पर जांच लें। यदि बिल्डर के खिलाफ पहले से दिवाला प्रक्रिया चल रही है, तो यह भी पता करें कि उस मामले में रेरा की कार्यवाही पर कोई कानूनी रोक या विशेष प्रभाव लागू है या नहीं। शिकायत दर्ज होना अपने आप राहत मिलने की गारंटी नहीं है; अंतिम निर्णय तथ्यों और लागू कानून के आधार पर होगा।


उपभोक्ता आयोग में रिफंड या कब्जे का दावा

फ्लैट खरीदार उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत संबंधित उपभोक्ता आयोग में शिकायत करने की संभावना भी देख सकते हैं। यह विकल्प उन मामलों में उपयोगी हो सकता है, जहां बिल्डर की सेवा में कमी, वादे के मुताबिक निर्माण न करना, कब्जा देने में अनुचित देरी या रकम लौटाने से इनकार करने जैसे मुद्दे हों। मामले के तथ्यों के आधार पर खरीदार रिफंड, ब्याज, मुआवजे या अन्य उचित राहत की मांग कर सकता है। शिकायत करने से पहले यह देखना जरूरी है कि मामला किस क्षेत्राधिकार वाले आयोग में दाखिल होगा, दावा किस सीमा के भीतर आता है और लागू समयसीमा क्या है। बुकिंग दस्तावेज, भुगतान का रिकॉर्ड, बिल्डर के वादे और पत्राचार जैसे प्रमाण शिकायत को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, अगर बिल्डर कंपनी के खिलाफ IBC के तहत दिवाला प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो कंपनी के खिलाफ कार्रवाई पर लागू रोक और दिवाला कानून के प्रभाव की जांच जरूरी है। हर मामले में उपभोक्ता आयोग की कार्यवाही जारी रखने की स्थिति एक जैसी नहीं होती। इसलिए शिकायत दाखिल करने से पहले संबंधित आदेशों और कानूनी स्थिति की जानकारी लेना समझदारी होगी।


IBC के तहत आवेदन और दावा कैसे दर्ज करें

अगर बिल्डर कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो फ्लैट खरीदार को सबसे पहले यह पता करना चाहिए कि मामले की सुनवाई किस NCLT पीठ में हो रही है और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल कौन है। इसके बाद सार्वजनिक घोषणा और दावे जमा करने के निर्देशों के अनुसार जरूरी दस्तावेजों के साथ अपना दावा प्रस्तुत करना चाहिए। दावे में भुगतान की कुल रकम, फ्लैट का विवरण, बुकिंग की तारीख, समझौते की शर्तें और अब तक हुई प्रगति स्पष्ट रखें। यदि दावा पहले दाखिल किया जा चुका है, तो उसकी प्राप्ति और स्वीकृत रकम का रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। खरीदारों को अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से CoC की बैठकों और समाधान योजना से जुड़े अपडेट भी प्राप्त करने चाहिए। IBC की प्रक्रिया में समयसीमा और दस्तावेजों का विशेष महत्व होता है, इसलिए देरी होने पर दावा प्रभावित हो सकता है। यह भी ध्यान रखें कि किसी कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू कराने के लिए आवेदन करना और पहले से चल रही प्रक्रिया में फ्लैट खरीदार के रूप में दावा दर्ज करना अलग-अलग बातें हैं। कौन-सा कदम उचित है, यह मामले की मौजूदा स्थिति और खरीदार के उद्देश्य पर निर्भर करेगा। जरूरत पड़ने पर IBC से जुड़े वकील या विशेषज्ञ से सलाह लें।


फ्लैट खरीदार अभी क्या करें

नोएडा या ग्रेटर नोएडा में किसी बिल्डर के आर्थिक संकट में फंसने पर सबसे पहले परियोजना और कंपनी की मौजूदा कानूनी स्थिति की पुष्टि करें। पता करें कि निर्माण वास्तव में रुका है या नहीं, RERA में परियोजना का क्या रिकॉर्ड है और NCLT में दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई है या नहीं। इसके बाद तय करें कि आपकी प्राथमिकता फ्लैट का कब्जा लेना है, रकम वापस पाना है या किसी आदेश का पालन कराना है। सभी भुगतान रसीदें, समझौते, बैंक रिकॉर्ड और बिल्डर से हुई बातचीत का विवरण एक जगह रखें। यदि दिवाला प्रक्रिया चल रही है, तो रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल और अधिकृत प्रतिनिधि से संपर्क कर दावा दर्ज करने की स्थिति जानें। रेरा या उपभोक्ता आयोग में जाने से पहले यह भी जांच लें कि IBC के कारण संबंधित कार्रवाई पर कोई रोक तो नहीं है। NCLAT का शुभकामना बिल्डटेक फैसला लेनदारों की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण स्पष्टता देता है, लेकिन हर परियोजना के तथ्य अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक फैसले को सभी मामलों पर लागू मानने के बजाय आधिकारिक आदेशों और अपनी स्थिति के आधार पर अगला कदम उठाएं।

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