CJP प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका, FIR नीति और आयोजकों की जवाबदेही पर उठी मांग
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एफआईआर दर्ज करने के लिए एक समान नीति बनाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि अलग-अलग राज्यों में एक जैसे मामलों में अलग-अलग कार्रवाई होती है, जिससे नागरिकों के अधिकार और कानून के समान अनुपालन पर सवाल उठते हैं।
- Babli Ansari
- 03 Aug, 2026
20 जुलाई को हुए 'संसद चलो' मार्च और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज एफआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में प्रदर्शन के आयोजकों की भूमिका की जांच कराने, विरोध-प्रदर्शनों के बाद एफआईआर दर्ज करने के लिए पूरे देश में एक समान नीति बनाने और सोशल मीडिया पर भड़काऊ या आपत्तिजनक पोस्टों पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका एक सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी की ओर से दाखिल की गई है। उनका कहना है कि फिलहाल अलग-अलग राज्यों में एक जैसी घटनाओं पर अलग-अलग तरीके से कार्रवाई की जा रही है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
आयोजकों की जिम्मेदारी तय करने की मांग
याचिका में कहा गया है कि किसी भी बड़े प्रदर्शन के दौरान यदि भड़काऊ नारे, विवादित बयान या सोशल मीडिया पर उकसाने वाली सामग्री सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि 20 जुलाई के 'संसद चलो' मार्च के आयोजकों की भूमिका की भी जांच कराई जाए। साथ ही यह पता लगाया जाए कि क्या किसी स्तर पर ऐसी भाषा या सामग्री का इस्तेमाल हुआ, जिसने माहौल को और तनावपूर्ण बनाया। याचिका में सोशल मीडिया पर वायरल हुई आपत्तिजनक पोस्टों की भी जांच की मांग शामिल है।
देशभर में एक जैसी FIR नीति की मांग
याचिका का सबसे अहम मुद्दा विरोध-प्रदर्शनों के बाद दर्ज होने वाली एफआईआर को लेकर है। इसमें कहा गया है कि अलग-अलग राज्यों में समान परिस्थितियों में अलग-अलग कानूनी कार्रवाई की जाती है। कहीं तुरंत एफआईआर दर्ज होती है, तो कहीं मामला अलग तरीके से निपटाया जाता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि पूरे देश के लिए एक समान और स्पष्ट नीति बनाई जाए, ताकि विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों में एकरूपता बनी रहे और कानून का समान रूप से पालन हो।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है अहम निर्देश
इस मामले से जुड़ी पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कार्रवाई में संयम बरतने का संकेत दिया था। अदालत ने कहा था कि सामान्य प्रदर्शन और गंभीर आपराधिक मामलों में अंतर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि जिन नाबालिगों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उनके मामलों में नरमी बरती जा सकती है। साथ ही राज्यों को यह छूट भी दी गई थी कि वे परिस्थितियों के अनुसार कुछ मामलों में एफआईआर वापस लेने या आगे कार्रवाई न करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि यह राहत गंभीर अपराधों वाले मामलों पर लागू नहीं होगी।
4 अगस्त की सुनवाई पर टिकी हैं निगाहें
अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों का पक्ष सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र समिति या विशेष जांच दल (SIT) से कराई जाए या नहीं। इसके अलावा पुलिस कार्रवाई, कथित बल प्रयोग और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने से जुड़े मुद्दे भी अदालत के सामने हैं। ऐसे में आने वाली सुनवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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