आजादी की रात 11 बजे गूंजा था ‘वंदे मातरम्’, फिर नेहरू ने दिया था ऐतिहासिक भाषण
- Babli Ansari
- 14 Aug, 2026
नई दिल्ली। इस बार 15 अगस्त का समारोह सिर्फ तिरंगे और प्रधानमंत्री के संबोधन तक सीमित नहीं रहेगा। लाल किले की प्राचीर से पहली बार ‘वंदे मातरम्’ का गायन होगा, और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र को संबोधित करेंगे। यह कदम ऐसे वक्त उठाया गया है जब देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है और राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने का संदेश भी समारोह के केंद्र में रखा गया है। कार्यक्रम को ‘युवा शक्ति’ थीम के साथ जोड़ा गया है, ताकि आज के भारत और 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य के बीच सीधा रिश्ता दिखे।
लाल किले पर बदलेगा स्वतंत्रता दिवस का क्रम
जानकारी के मुताबिक, इस बार समारोह की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ से होगी और उसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ गूंजेगा। सुरक्षा और औपचारिक तैयारियों के साथ-साथ प्रोटोकॉल में यह बदलाव प्रतीकात्मक रूप से बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि आजादी के इतने वर्षों बाद पहली बार राष्ट्रीय गीत को लाल किले की मुख्य रस्म में जगह मिली है। रक्षा मंत्रालय की ब्रिफिंग में भी इस विशेष प्रस्तुति का संकेत दिया गया था। समारोह में एनसीसी कैडेट्स और ‘माय भारत’ स्वयंसेवकों की भागीदारी भी रखी गई है, ताकि आयोजन का स्वर सिर्फ सरकारी न रहकर युवा ऊर्जा से जुड़ा दिखाई दे।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार ने इसे देश की सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्रीय भावनाओं को एक साथ जोड़ने वाली पहल के तौर पर देखा है। यही वजह है कि इस बार आयोजन में औपचारिकता के साथ भावनात्मक संदेश भी साफ तौर पर दिया जा रहा है। ‘वंदे मातरम्’ की यह प्रस्तुति केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का सार्वजनिक स्मरण है, जिसने पीढ़ियों को जोड़े रखा। 15 अगस्त की सुबह लाल किले पर यह क्रम नए संदेश के साथ दिखेगा—पहले राष्ट्रीय गीत, फिर तिरंगा और उसके बाद प्रधानमंत्री का संबोधन।
150 साल पुराने गीत को फिर मिली केंद्रीय जगह
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी और यह स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया। अलग-अलग समाचार माध्यमों में दिए गए विवरण के मुताबिक, इस साल इसकी 150वीं वर्षगांठ को केंद्र सरकार ने खास ढंग से मनाने का फैसला किया है। इसी क्रम में देशभर में स्वतंत्रता दिवस समारोहों के दौरान भी इसके गायन को लेकर निर्देश और अभ्यास तेज हुए हैं। कुछ जगहों पर आधिकारिक समारोहों में इसे राष्ट्रगान से पहले प्रस्तुत करने की तैयारी की गई है, जबकि अदालतों और सरकारी संस्थानों में भी विशेष परिपत्र जारी हुए हैं।
इसी बीच यह बहस भी फिर उभरी है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान की औपचारिक भूमिका क्या है, और किस क्रम में इन्हें प्रस्तुत किया जाता है। नियमों के मुताबिक, जहां दोनों का गायन होता है, वहां ‘वंदे मातरम्’ पहले और ‘जन गण मन’ बाद में गाया जाता है। कई आयोजनों में राष्ट्रगीत को केवल औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि सम्मान और अनुशासन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस साल का लाल किला समारोह उसी भाव को बड़े पैमाने पर सामने लाने जा रहा है, और यही वजह है कि इसकी चर्चा सरकारी गलियारों से निकलकर आम लोगों तक पहुंच गई है।
युवा शक्ति और राष्ट्रीय संदेश दोनों पर फोकस
समारोह में ‘युवा शक्ति’ को केंद्र में रखने की रणनीति साफ दिख रही है। सरकार चाहती है कि स्वतंत्रता दिवस केवल इतिहास के स्मरण का दिन न रहे, बल्कि भविष्य की दिशा बताने वाला मंच भी बने। इसी वजह से मंच पर युवाओं की भागीदारी, कैडेट्स की मौजूदगी और सांस्कृतिक प्रस्तुति को एक साथ पिरोया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, इस आयोजन से यह संदेश जाएगा कि आजादी सिर्फ विरासत नहीं, जिम्मेदारी भी है। देश की नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों से जोड़ना और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में लाना इस साल के कार्यक्रम की बड़ी लाइन है।
अलग-अलग शहरों और राज्यों में भी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर तैयारियां तेज हैं। कुछ स्थानों पर पूरा गीत गाने की योजना है, तो कई संस्थानों ने इसके औपचारिक पाठ और क्रम को लेकर प्रशिक्षण शुरू कर दिया है। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इस फैसले को लेकर उत्सुकता बढ़ी है, क्योंकि लाल किले से इसकी पहली प्रस्तुति केवल एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति का सार्वजनिक पुनरावलोकन मानी जा रही है। अब नजरें 15 अगस्त की सुबह पर हैं, जब दिल्ली की प्राचीर से यह इतिहास पहली बार नए स्वर में दर्ज होगा।
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