बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में यूपी के दो मुस्लिम चेहरे, 2027 चुनाव से पहले संदेश साफ

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बीजेपी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली को अहम जिम्मेदारी देकर मुस्लिम सियासत में बड़ा संकेत दिया है। इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की सामाजिक और संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

लखनऊ। बीजेपी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम चेहरों को आगे कर राजनीतिक संदेश को और साफ कर दिया है। पूर्व एएमयू कुलपति और विधान परिषद सदस्य प्रो. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में बरकरार रखा गया है, जबकि कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा की कमान सौंपी गई है। संगठन में यह फेरबदल ऐसे वक्त हुआ है जब पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है और पश्चिमी यूपी के मुस्लिम बहुल, लेकिन सामाजिक रूप से बंटे हुए इलाकों पर उसकी नजर टिकी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यह सिर्फ पदोन्नति नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक कवायद है, जिसके जरिए बीजेपी अपने अल्पसंख्यक संपर्क को नए सिरे से धार देना चाहती है।


तारिक मंसूर और बासित अली को क्यों मिली बड़ी भूमिका

सूत्रों के अनुसार, तारिक मंसूर को संगठन में बनाए रखना बीजेपी की उस नीति का हिस्सा है जिसमें पार्टी पढ़े-लिखे, प्रभावशाली और गैर-पारंपरिक मुस्लिम चेहरों को आगे रखकर अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। मंसूर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति रहे हैं और लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े हैं। उनकी छवि एक ऐसे मुस्लिम नेता की रही है जो संगठनात्मक कामकाज में भरोसेमंद माने जाते हैं। दूसरी ओर, कुंवर बासित अली ने यूपी अल्पसंख्यक मोर्चे में लगातार काम करते हुए जमीनी पहचान बनाई है। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लाकर साफ संकेत दिया है कि अब अल्पसंख्यक मोर्चे को सिर्फ प्रतीकात्मक मंच नहीं, बल्कि चुनावी नेटवर्क के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

जानकारी के मुताबिक, बासित अली खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहे हैं और जाट, गुर्जर, राजपूत तथा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में उनकी पकड़ को अहम माना जाता है। बताया जा रहा है कि संगठन ने उन्हें उन करीब 100 सीटों पर फोकस करने की जिम्मेदारी दी है, जहां सामाजिक समीकरण चुनाव का रुख बदल सकते हैं। इसी वजह से उनकी नियुक्ति को साधारण बदलाव नहीं माना जा रहा। बीजेपी की कोशिश है कि Pasmanda मुस्लिमों तक सीधा संदेश जाए कि पार्टी अब सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि संगठन के ढांचे में भी उन्हें जगह दे रही है। यही वजह है कि यूपी से दो मुस्लिम नेताओं को एक साथ राष्ट्रीय टीम में प्रमुख पद मिले हैं।


बीजेपी की रणनीति और यूपी का सियासी गणित

पश्चिमी यूपी बीजेपी के लिए हमेशा से नफासत, जातीय संतुलन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, तीनों का मिला-जुला मैदान रहा है। 2027 के चुनाव में पार्टी चाहती है कि मुसलमानों के भीतर एकसमान वोट बैंक की धारणा को तोड़ा जाए और Pasmanda, स्थानीय प्रभाव वाले चेहरों तथा प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के जरिए नई सेंध लगाई जाए। तारिक मंसूर और बासित अली की तैनाती इसी रणनीति से जुड़ी मानी जा रही है। संगठन के अंदर भी इसे यूपी, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों के लिए पहले से की जा रही तैयारी का हिस्सा बताया जा रहा है, जहां बीजेपी अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ वर्गों के साथ अलग तरह का संवाद बनाना चाहती है।

बीजेपी के लिए यह दांव इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश में मुस्लिम मतदाता अभी भी बड़े पैमाने पर सपा और कांग्रेस जैसे दलों के साथ जाते रहे हैं। ऐसे में पार्टी की कोशिश है कि पूरी बिरादरी के बजाय उसके भीतर मौजूद सामाजिक और वर्गीय विभाजनों को राजनीतिक रूप दिया जाए। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मंसूर और बासित अली की नई भूमिका से बीजेपी को तुरंत चुनावी फायदा भले न मिले, लेकिन यह संदेश जरूर जाएगा कि पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चे को लेकर आक्रामक तैयारी में है। अब नजर इस पर रहेगी कि ये दोनों नेता जमीन पर किस तरह की सक्रियता दिखाते हैं और क्या उनकी तैनाती से पश्चिमी यूपी के समीकरण में कोई ठोस बदलाव आता है या नहीं।

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