30 दिन की पैरोल लेकर फरार हुआ हत्यारा, 40 साल तक बना रहा ‘बेस्ट टीचर’
- Babli Ansari
- 27 Aug, 2026
हैदराबाद। तेलंगाना से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने जेल प्रशासन और भर्ती व्यवस्था—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा आरोपी 1983 में 30 दिन की पैरोल पर बाहर निकला और फिर कभी जेल नहीं लौटा। बाहर निकलने के बाद उसने न सिर्फ अपनी पहचान छिपाकर नई जिंदगी शुरू की, बल्कि सरकारी शिक्षक की नौकरी भी हासिल कर ली। हैरानी की बात यह रही कि सेवा के दौरान उसे 'बेस्ट टीचर' पुरस्कार तक मिल गया। करीब 40 साल बाद, मई 2024 में उसे गिरफ्तार किया गया और अब तेलंगाना हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए जेल में वापसी पर मुहर लगा दी है।
पैरोल से शुरू हुई फरारी, फिर मिली सरकारी नौकरी
जानकारी के मुताबिक, वारंगल की अदालत ने 1983 में संडेला वीरन्ना को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वह उस समय चंचलगुड़ा जेल में बंद था। 17 दिसंबर 1983 को उसे 30 दिन की पैरोल मिली, जिसे आगे बढ़ाकर 17 मार्च 1984 तक कर दिया गया। नियम के मुताबिक उसे 18 मार्च को लौटना था, लेकिन वह फरार हो गया। इसके बाद वह करीब चार दशक तक बाहर रहा। इस दौरान उसने महबूबाबाद जिले के दंतलापल्ली इलाके में सरकारी शिक्षक के तौर पर काम किया। अदालत में पेश रिकॉर्ड के अनुसार, उसने अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि छिपाकर नौकरी हासिल की थी। बाद में सेवा के दौरान उसे 2004 में 'बेस्ट टीचर' सम्मान भी मिला।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, सिस्टम पर उठे सवाल
इस पूरे मामले की परतें तब खुलीं जब तेलंगाना हाईकोर्ट में उसकी पत्नी ने पैरोल से जुड़ी राहत की मांग की। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि वीरन्ना वर्षों तक कानून की पकड़ से दूर रहा और सरकारी सेवा में बना रहा। जस्टिस टी. मधवी देवी ने सुनवाई के दौरान इस पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि आपराधिक इतिहास छिपाकर नौकरी में प्रवेश करना गंभीर धोखा है। कोर्ट ने यह भी माना कि जेल से पैरोल पर छोड़े गए कैदियों की निगरानी व्यवस्था बेहद कमजोर रही। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि पैरोल पर छोड़े गए बंदियों की ट्रैकिंग के लिए पुख्ता सिस्टम बनाया जाए, ताकि ऐसा मामला दोबारा न दोहराया जाए।
40 साल बाद गिरफ्तारी, अब जेल वापसी तय
रिपोर्ट्स के मुताबिक, विशेष टास्क फोर्स ने 16 मई 2024 को वीरन्ना को पकड़ा। यह उस तारीख से ठीक 40 साल, 1 महीने और 28 दिन बाद था, जब उसे जेल लौटना था। गिरफ्तारी के बाद उसे चेरलापल्ली सेंट्रल जेल भेज दिया गया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी ने लंबे समय तक सरकारी सेवा की, रिटायरमेंट तक पहुंच गया और तब तक किसी को उसकी असल पहचान का पता नहीं चला। यह मामला अब सिर्फ एक अपराधी की फरारी का नहीं, बल्कि सिस्टम की चूक और रिकॉर्ड जांच की कमजोरियों का भी प्रतीक बन गया है। पुलिस और जेल विभाग के लिए यह केस आने वाले दिनों में जांच और जवाबदेही की बड़ी कसौटी बन सकता है।
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