अरुणाचल के सियांग में हिंसा क्यों भड़की, चीन के मेगा डैम के जवाब में प्रस्तावित है 11, 200 मेगावाट परियोजना
- Babli Ansari
- 25 Oct, 2026
ईटानगर। अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना को लेकर शुरू हुआ विरोध शुक्रवार रात हिंसा में बदल गया। पूर्वी सियांग जिले के पासीघाट में प्रदर्शनकारियों ने एनएचपीसी कार्यालय और एक पुलिस थाने में आग लगा दी, पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचाया और कुछ राजनीतिक नेताओं के आवासों पर भी धावा बोला। पुलिस के मुताबिक पथराव में 40 से अधिक जवान घायल हुए हैं। तनाव उस 12 घंटे के बंद के बाद बढ़ा, जिसे सियांग, अपर सियांग और पूर्वी सियांग जिलों में परियोजना के विरोध में बुलाया गया था। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि सरकार उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज कर रही है। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में भीड़ और जुलूस पर पाबंदी लगा दी है।
बंद के बाद बिगड़े हालात, कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ी
जानकारी के मुताबिक बंद शाम पांच बजे तक काफी हद तक शांत रहा, लेकिन रात में हालात अचानक बेकाबू हो गए। प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए 10 कार्यकर्ताओं की रिहाई, निलंबित गांव बुजुर्गों की बहाली और परियोजना से जुड़ी प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट की गतिविधियां रोकने की मांग कर रहे थे। पासीघाट में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। इस दौरान कुछ महिलाओं के घायल होने की भी सूचना है। एनएचपीसी कार्यालय, पुलिस स्टेशन और सरकारी संपत्तियों पर हमले के बाद इलाके में अतिरिक्त बल तैनात किया गया। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। सरकार ने बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात कही है।
चीन के ब्रह्मपुत्र बांध के जवाब में देखी जा रही परियोजना
सियांग परियोजना को सरकार केवल बिजली उत्पादन की योजना नहीं मान रही। इसके पीछे चीन की ओर से ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा में प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर रणनीतिक चिंता भी जुड़ी है। सरकारी पक्ष का कहना है कि भारत की यह परियोजना सियांग नदी के जलप्रवाह को नियंत्रित करने, बाढ़ के खतरे को घटाने और सीमावर्ती क्षेत्र में जल संसाधनों पर पकड़ मजबूत करने में मदद कर सकती है। परियोजना पूरी होने पर इसकी क्षमता 11,200 मेगावाट बताई जा रही है। हालांकि अभी सरकार प्रारंभिक व्यवहार्यता और तकनीकी आकलन के चरण में है। यानी अंतिम निर्माण योजना, जलाशय का आकार और प्रभावित गांवों की संख्या पर फैसला नहीं हुआ है। यही बात स्थानीय लोगों के अविश्वास को और बढ़ा रही है।
विस्थापन और नदी से रिश्ते के टूटने का डर
सियांग घाटी के आदिवासी समुदायों को आशंका है कि बांध और जलाशय बनने से गांव डूब सकते हैं, खेती की जमीन जा सकती है और लोगों का नदी से पीढ़ियों पुराना रिश्ता टूट सकता है। प्रभावित क्षेत्र के संगठनों का कहना है कि सियांग केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का आधार है। सरकार संवाद और स्थानीय सहमति की बात कर रही है, मगर जमीनी स्तर पर भरोसा कायम नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि आंदोलनकारी चाहते हैं कि जब तक व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय अध्ययन सार्वजनिक न हो, तब तक सर्वे का काम रोका जाए। अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—रणनीतिक जरूरतों के साथ परियोजना आगे बढ़ाना और स्थानीय आबादी की सहमति हासिल करना। आने वाले दिनों में बातचीत और सुरक्षा व्यवस्था ही हालात की दिशा तय करेगी।
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