नोएडा में हत्या के मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला, दो दोषियों को उम्रकैद, 20-20 हजार का लगाया जुर्माना, 12 साल पहले आरोपियों ने रंजिश में मार दी थी युवक को गोली

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नोएडा में हत्या के मामले में गौतमबुद्ध नगर की एडीजे कोर्ट ने 2014 के बोड़ाकी हत्याकांड में दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पुरानी रंजिश में युवक की गोली मारकर हत्या की गई थी। अदालत ने अवैध हथियार रखने के अपराध में भी सजा और अर्थदंड लगाया।

नोएडा में हत्या के मामले में  गौतमबुद्ध नगर की एडीजे कोर्ट ने वर्ष 2014 में दादरी थाना क्षेत्र के गांव बोड़ाकी में हुई युवक सूबे की हत्या के मामले में दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। फैसला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पॉक्सो-3 राजेश कुमार मिश्रा की अदालत ने सुनाया। अदालत ने हत्या के साथ-साथ अवैध हथियार रखने के अपराध में भी दोष सिद्ध माना और अर्थदंड भी लगाया।


पुरानी रंजिश में मारी गई थी गोली

एडीजीसी क्राइम शिल्पी भदौरिया के अनुसार, 16 मार्च 2014 की रात करीब 8:45 बजे 23 वर्षीय सूबे पुत्र भगवत सिंह खाना खाने के बाद रेलवे लाइन की ओर टहलने निकले थे। आरोप है कि गांव के ही ईश्वर पुत्र भंवर सिंह और गजेन्द्र पुत्र घनश्याम ने पुरानी रंजिश के चलते उन्हें गोली मार दी। मृतक की बहन गीता ने थाना दादरी में तहरीर देकर बताया था कि उसने और उसकी मां ने आरोपियों को पहले “निपटाने” की बात करते सुना था। गोली लगने के बाद सूबे को अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने से मृत्यु की पुष्टि हुई।


तीन दिन बाद गिरफ्तारी, तमंचे बरामद

घटना के तीन दिन बाद 19 मार्च 2014 को पुलिस ने दोनों आरोपियों को जीटी रोड स्थित एनटीपीसी तिराहे के पास गिरफ्तार किया। तलाशी में उनके पास से एक-एक देसी तमंचा और दो-दो जिंदा कारतूस बरामद किए गए। हत्या और आयुध अधिनियम के मामलों की संयुक्त रूप से सत्र परीक्षण में सुनवाई हुई। बचाव पक्ष ने बरामदगी पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं थे, लेकिन अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि केवल स्वतंत्र गवाह न होने से पुलिसकर्मियों की गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती, यदि वह सुसंगत और भरोसेमंद हो।


मृत्युदंड नहीं, उम्रकैद

सजा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दया की अपील की और कहा कि आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। अदालत ने माना कि मामला “विरल से विरलतम” श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड नहीं दिया गया। हालांकि अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों को आजीवन कारावास और 20-20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। अर्थदंड न देने पर 60 दिन का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा।

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