100 साल में पहली बार! पंजाब-हरियाणा HC में 19 महिला जज, बना ऐतिहासिक रिकॉर्ड
- Babli Ansari
- 21 Aug, 2026
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। नौ नए अतिरिक्त जजों के शपथ लेने के बाद अदालत में महिला जजों की संख्या 19 पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। हाई कोर्ट के 100 साल से ज्यादा पुराने सफर में यह पहली बार है जब बेंच पर इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद हैं। सूत्रों के मुताबिक, यह बदलाव सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की तस्वीर बदलने वाला कदम भी माना जा रहा है। नए जजों के शामिल होने के बाद अदालत की कार्यक्षमता और लंबित मामलों के निपटारे की उम्मीद भी बढ़ी है।
जानकारी के मुताबिक, शपथ लेने वालों में तीन महिला जज भी शामिल रहीं, जिनके आने से महिला जजों की कुल संख्या 19 तक पहुंच गई। इससे पहले इस साझा हाई कोर्ट में महिला जजों की अधिकतम संख्या 18 रही थी, जबकि एक वक्त यह आंकड़ा 13 तक सीमित था। अदालत के भीतर इसे महज नियुक्ति प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन की दिशा में अहम बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है। वरिष्ठ कानूनी हलकों में इस बात की चर्चा तेज है कि लंबे समय तक पुरुष-प्रधान रहे न्यायिक ढांचे में अब महिलाओं की हिस्सेदारी लगातार मजबूत हो रही है। यही वजह है कि इस बार का शपथग्रहण सिर्फ प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक मोड़ भी बन गया।
हाई कोर्ट में बढ़ी कुल कार्यरत ताकत
नौ नए जजों की नियुक्ति के बाद पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की कार्यरत संख्या भी बढ़कर 55 हो गई है। जबकि स्वीकृत पदों की कुल संख्या 85 है, यानी अभी भी 30 सीटें खाली हैं। यह अंतर लंबे समय से अदालत पर बोझ बढ़ा रहा था और लंबित मामलों की फाइलें लगातार बढ़ती जा रही थीं। अमर उजाला और ट्रिब्यून की रिपोर्टों के मुताबिक, नई नियुक्तियों में हरियाणा के महाधिवक्ता प्रवीणेंद्र सिंह चौहान समेत मोनिका छिब्बर शर्मा, हरमीत सिंह देओल, राजेश गौड़, पूजा चोपड़ा, सुनीश बिंदलिश, मिंदरजीत यादव, दिव्या शर्मा और रविंदर मलिक शामिल हैं। केंद्र सरकार की अधिसूचना और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह प्रक्रिया पूरी हुई।
लंबित मामलों पर असर और आगे की उम्मीद
कानूनी जानकारों का मानना है कि अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से न सिर्फ कामकाज की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि पुराने मामलों के निपटारे में भी कुछ राहत मिल सकती है। हाई कोर्ट में वर्षों से पेंडिंग मामलों का दबाव रहा है, और इसलिए हर नई नियुक्ति को प्रशासनिक सुधार के तौर पर देखा जाता है। सूत्रों के अनुसार, इस बार का खास पहलू महिला प्रतिनिधित्व में आया उछाल है, जिसने न्यायिक संस्थाओं में विविधता की बहस को फिर से आगे ला दिया है। अदालत के भीतर और बाहर, यह संदेश साफ गया है कि शीर्ष न्यायपालिका में महिलाओं की मौजूदगी अब अपवाद नहीं, बल्कि तेजी से मजबूत होती सच्चाई बन रही है।
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