मुजफ्फरनगर में ईंट भट्ठे की कच्ची दीवार गिरने से मजदूर की मौत, 15 लाख मुआवजे पर बना समझौता
- Babli Ansari
- 12 Jun, 2026
मुजफ्फरनगर। जिले में ईंट भट्ठे पर हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर कच्चे निर्माण और मजदूर सुरक्षा की हालत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार सुबह तेज आंधी और मूसलाधार बारिश के बीच भट्ठे की एक कच्ची दीवार भरभराकर गिर गई, जिसकी चपेट में आकर मजदूर अजय गंभीर रूप से घायल हो गए। साथी मजदूरों ने किसी तरह उन्हें मलबे से निकाला, लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उनकी जान नहीं बच सकी। मौत की खबर फैलते ही मौके पर अफरा-तफरी मच गई और परिजनों के साथ मजदूरों ने मुआवजे की मांग को लेकर हंगामा शुरू कर दिया।
मौके पर मचा हंगामा, घंटों चली बातचीत
जानकारी के मुताबिक हादसा सुबह करीब पांच बजे हुआ, जब मौसम अचानक बिगड़ गया और भट्ठे के परिसर में पानी भरने लगा। इसी दौरान कच्ची दीवार ढह गई और अजय उसके नीचे दब गए। घटना के बाद भट्ठा परिसर में काम कर रहे मजदूरों ने प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया। परिजनों का कहना था कि कमजोर दीवार और बारिश के बीच कामकाज जारी रखना सीधे-सीधे खतरे को न्योता देना था। इसके बाद मृतक के परिवार को तात्कालिक मदद और स्थायी मुआवजे को लेकर करीब नौ घंटे तक तनाव बना रहा। प्रशासनिक अफसरों को मौके पर पहुंचकर हालात संभालने पड़े।
सूत्रों के अनुसार, बातचीत में किसान नेता भी शामिल हुए और भट्ठा स्वामी संदीप मलिक से कई दौर की वार्ता हुई। लंबी खींचतान के बाद सहमति बनी कि भट्ठा स्वामी की ओर से परिवार को 10 लाख रुपये दिए जाएंगे, जबकि जिला प्रशासन पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएगा। साथ ही बच्चों को 18 साल की उम्र तक चार हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन, अंत्योदय राशन कार्ड और मृतक की पत्नी को विधवा पेंशन योजना का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया गया। समझौते के बाद ही परिजनों ने अंतिम कार्रवाई को आगे बढ़ने दिया।
कच्चे ढांचे और मौसम की मार पर फिर सवाल
भट्ठा उद्योग में काम करने वाले मजदूरों के लिए ऐसी घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन हर हादसे के बाद जो मुआवजा समझौता होता है, वह स्थायी समाधान की कमी को ही उजागर करता है। तेज बारिश और आंधी के बीच कमजोर ढांचे का गिरना इस बात का संकेत है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी अब भी गंभीर समस्या बनी हुई है। स्थानीय स्तर पर मजदूर संगठनों का कहना है कि भट्ठों में अस्थायी निर्माण, खुले में रहन-सहन और सुरक्षा इंतजामों की कमी मजदूरों को सबसे ज्यादा जोखिम में डालती है। प्रशासन की ओर से यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कामकाज शुरू होने से पहले ऐसे ढांचों की जांच हो।
घटना के बाद इलाके में गुस्सा साफ दिखा। परिजनों ने साफ कहा कि आर्थिक मदद जरूरी है, लेकिन जान की भरपाई किसी रकम से नहीं हो सकती। ग्रामीणों और मजदूरों के बीच भी चर्चा रही कि बारिश के मौसम में भट्ठों पर निगरानी और सख्ती बढ़नी चाहिए। फिलहाल समझौते के बाद मामला शांत हो गया है, लेकिन अजय की मौत ने एक बार फिर उस हकीकत को सामने ला दिया है जिसमें मेहनत करने वाले लोग सबसे पहले और सबसे ज्यादा खतरे में रहते हैं। प्रशासनिक हलकों में अब इस बात पर नजर है कि घोषित सहायता समय पर मिल भी पाती है या नहीं।
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