खाने के पैकेट पर लाल निशान, FSSAI का 365 दिन का प्लान… लेकिन 2028 तक इंतजार! NGO ने क्यों जताई आपत्ति

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पैकेट वाले खाने में ज्यादा चीनी, नमक या फैट की जानकारी देने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल को लेकर फिर विवाद तेज हो गया है।

पैकेट वाले खाने में ज्यादा चीनी, नमक या फैट की जानकारी देने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल को लेकर फिर विवाद तेज हो गया है। FSSAI ने कंपनियों के लिए 365 दिन की स्वैच्छिक अवधि का प्रस्ताव रखा है, जिस पर NGO ने सवाल उठाते हुए इसे घटाकर एक महीने करने की मांग की है।


खाने के पैकेट पर दिखेगा Warning Label

पैकबंद खाने और पेय पदार्थों में ज्यादा चीनी, नमक या फैट की जानकारी उपभोक्ताओं को सामने ही देने के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में है। FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इस संबंध में प्रस्ताव रखा है, जिसमें पैकेट के सामने लाल रंग के चेतावनी लेबल का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य यह बताना है कि किसी उत्पाद में तय सीमा से ज्यादा संबंधित पोषक तत्व मौजूद हैं। हालिया प्रस्ताव में हाई शुगर, हाई साल्ट और हाई फैट जैसे संदेशों वाले चेतावनी लेबल की बात सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट भी इस प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर FSSAI से सवाल कर चुका है।


365 दिन की मोहलत पर NGO का सवाल

अब विवाद FSSAI की प्रस्तावित टाइमलाइन को लेकर है। FSSAI ने नियमों को अंतिम रूप देने के बाद कंपनियों को 365 दिन की स्वैच्छिक अवधि देने का प्रस्ताव रखा है। इसके बाद लेबलिंग को अनिवार्य रूप से लागू करने की बात कही गई है। इसी अवधि पर 3S and Our Health Society नाम के NGO ने आपत्ति जताई है। NGO का कहना है कि अगर नियमों को अंतिम रूप देने में समय लगता है और उसके बाद कंपनियों को पूरा एक साल दिया जाता है, तो उपभोक्ताओं को अनिवार्य चेतावनी लेबल के लिए काफी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। संगठन ने इस अवधि को एक महीने तक सीमित करने की मांग की है। यह NGO वही संस्था है जिसकी याचिका से जुड़ी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मुद्दा प्रमुखता से उठा।


आखिर Warning Label में क्या दिखेगा?

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का मकसद यह है कि ग्राहक को खरीदारी के वक्त पैकेट के पीछे लिखी लंबी न्यूट्रिशन टेबल पढ़ने की जरूरत न पड़े और वह सामने देखकर समझ सके कि उत्पाद में चीनी, नमक या फैट का स्तर ज्यादा है या नहीं। अगस्त में FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट में लाल रंग के हेक्सागोनल वॉर्निंग लेबल का प्रस्ताव रखा था। शुरुआती प्रस्ताव में चरणबद्ध व्यवस्था की बात थी, जिसमें पहले चरण में दो या उससे ज्यादा पोषक तत्व तय सीमा से अधिक होने पर चेतावनी देने का प्रस्ताव था। हालांकि सितंबर में FSSAI की ओर से सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी में एक चरण वाली व्यवस्था की दिशा में बदलाव की बात सामने आई, जिसमें एक भी संबंधित पोषक तत्व तय सीमा से अधिक होने पर चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव बताया गया।


अब नजर सुप्रीम कोर्ट और FSSAI की अगली कार्रवाई पर

इस पूरे मामले में अगला अहम सवाल यही है कि अंतिम नियम कब तैयार होते हैं और कंपनियों को कितनी समयसीमा दी जाती है। सितंबर में FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नियमों को अंतिम रूप देने में लगभग चार महीने लग सकते हैं, जिसमें 60 दिन का सार्वजनिक और WTO कमेंट पीरियड भी शामिल है। इसके बाद 365 दिन की ट्रांजिशन अवधि का प्रस्ताव है। इस गणना के आधार पर चेतावनी लेबल के अनिवार्य रूप से लागू होने का सबसे शुरुआती समय जुलाई 2028 बताया गया है। दूसरी तरफ NGO का कहना है कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से जुड़े लेबल के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं होना चाहिए। यानी अब पूरा मामला सिर्फ लेबल कैसा होगा, इस पर नहीं बल्कि कब से पैकेट पर दिखाई देगा, इस पर भी टिक गया है।

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